‘जड़ी-बूटियों’ पर थी जीवन की आस

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की चिंता आज भी बरकरार है, किन्तु वर्षोँ पूर्व पहाड़ के हर बुजुर्ग डाक्टर थे. वे बच्चों की छोटी-मोटी बीमारियों में लोगों का जीवन बचा लेते थे. जड़ी-बूटी पहचानने में कुछ ख़ास पारंगत भी होते थे, जिन्हें आयुर्वेद वैद्य यानी गांव के डाक्टर कहते थे. घर के ज्यादातर…

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‘दरांती/दाथडी’ पहाड़ी महिलाओं की सच्ची साथी

किसी भी कार्य के लिए उस कार्य में लगने वाला उपकरण सही होना जरूरी होता है. पहाड़ की महिलाओँ की साथी है दरांती ‘दाथडी’. घास-लकड़ी, खेतों की सफाई-निराई में दरांती महिलाओं की सबसे करीबी साथी है. कमर के पागडे में लगी ये कामकाजी महिलाओं की शोभा बढाती हैं. महिलाएं भी अपनी दरांती की धार कुंद…

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बांधकर रखे जाते थे पहाड़ के बच्चे

गाँव के जिन घरों में बुजुर्ग होते थे, वहां तो देखभाल की समस्या नहीं रहती थी. लेकिन जिन घरों में महिलाएं अकेली होती थी वहां बच्चों की देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं होती थी. कामकाज में लगी महिलाएं सुबह बच्चों को घर में एक जगह पर बांध कर अपने काम को चली जाती थी. काम…

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गर्म लोहे से जलाये जाते थे पहाड़ के नवजात

उतराखंड में बच्चों का जन्म घर पर ही होता था. इसलिए जन्म के बाद बच्चों की कोई चिकित्सा सलाह देने वाले नहीं होते थे. पहाड़ों में छोटे बच्चों के जन्म के बाद बहुत कठिन पीड़ा से गुजरना पड़ता था. बच्चों की तंदुरस्ती के लिए २० दिन के बच्चे के नाभि स्थल को लाल सुईयों के…

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प्रसूता की शुद्धता के प्रतीक थे ‘स्वाले’

गांवों में प्रसव के बाद महिला को तब तक शुद्ध नहीं माना जाता था, जब तक वह पूजा-हवन के द्वारा शुद्ध न हुई हो. नवजात बच्चे को भी तब तक खाना बनाने वाले कमरे में नहीं ले जाया जाता. जच्चा-बच्चा के शुद्धिकरण की पूजा गांवों में बच्चे के जन्म के बाद ११वें दिन भी की…

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महीने के आधार पर रखे जाते थे नाम

पहाड़ जो लोग पड़े-लिखे थे वे तो बच्चों का नाम आसानी से रख देते थे, लेकिन ज्यादातर लोग नाम रखने में ज्यादा शोध नहीं करते थे. बच्चा जिस महीने में जन्मा उसी के हिसाब से नाम रख लेते थे. चैत्र में जन्मे तो चेतू, वैशाख में जन्मे तो वैशाखू, जेठ में हुए तो जेठू, आषाड…

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पंचोला को घर के बाहर आते हैं बच्चे

पहाड़ के घरों में जन्मा बच्चा जन्म के पांच दिन बाद घर से बाहर लाया जाता है. इस दिन को  पहाड़ में ‘पंचोला’ कहा जाता है. इस दिन सुबह से घर की साफ़-सफाई. मिट्टी से लिपाई-पोताई कर पवित्र जल का छिड़काव किया जाता है. पंडितों द्वारा जल में गोमूत्र मिलाकर मंत्रोच्चार से जल शुद्ध किया…

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गुरूजी तय करते थे जन्मतिथि

पहाड़ों में जब घरों में नई किलकारी गूंजती थी यानि बच्चों का जन्म होता था तो न समय देखने के लिए घडियां थी न तारीखें देखने की व्यवस्था. बच्चे होते थे तो दिन में हुआ तो धूप जिस जगह पर होती उधर निशान लगा देते या रात होती तो रुमक, आधा रात या उस हिसाब…

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जीवन देती हैं दाई

पहाड़ के जीवन की जब हम बात करें तो इन्शान को जन्म देने वाली माँ के साथ ही दूसरी बड़ी महत्वपूर्ण महिला गाँव में ‘दाई’ होती थी. दाईयों को पहाड़ में महिलाओँ को दूसरा जन्म देने वाली माँ भी कहा जाता था. सकुशल प्रसब करना और इस वेदना में बच्चे और माँ का जीवन बचाना…

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आज चांदपुर गढ़ी में राजवंशी करेंगे नंदा की पूजा

टिहरी के राजा के प्रतिनिधि के तौर पर राजा कीर्ति प्रताप सिंह और ठाकुर भवानी सिंह चांदपुर गढ़ी में अपनी अराध्य देवी मां श्रीनंदा की पूजा करेंगे. राजजात समिति के राजा किन्हीं कारणों से नहीं आ रहे हैं. लेकिन उनके प्रतिनिधि के तौर पर टिहरी दरबार से उनके परिवार के दो सदस्य पहुंचगे. विदित हो…

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