सत्य की विजय का पर्व दशहरा

अन्याय, अत्याचार, अहंकार, विघटन और आतंकवाद आदि संसार के कलंक हैं. इतिहास पुराण गवाह हैं कि जब-जब आसुरी शक्तियां सिर उठाती रही हैं. तब-तब इस धरती में महापुरुषों ने जन्म लिया और आसुरी शक्तियों का विनाश किया. त्रेता युग में रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, खरदूषण, ताड़का, त्रिशरा आदि और द्वापर में कंस, पूतना, बकासुर के अलावा दुर्योधन आदि कौरवों के रूप में भी इन असुरों पर श्रीराम जैसे आदर्श महापुरुष साधन संपदा नहीं होते हुए भी केवल आत्मबल के माध्यम से इन पर विजय होते रहे हैं. रावण द्वारा सीता का हरण कोई सामान्य अपहरण नहीं था. वह एक राष्ट्र की अस्मिता एवं संस्कृति का हरण था. जिसकी रक्षा के लिए भगवान श्रीराम ने रीछ, वानरों जैसे सामान्य प्राणियों को संगठित किया. अजेय और दुर्लंघ्य कहे जाने वाले समुद्र से घिरे लंका जैसे दुर्ग का भेदन कर राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा कर सके. दशहरा को दुर्गा पूजा त्योहार की समाप्ति होती है. इस दिन विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है. इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था. और सारा समाज भयमुक्त हुआ था. रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी. मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था. इसीलिए रावण दहन आज भी बहुत धूमधाम से किया जाता है. इसके साथ ही आतिशबाजियां छोड़ी जाती हैं. दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर पूजा करने वाले भक्त मूर्ति-विसर्जन का कार्यक्रम भी गाजे-बाजे के साथ करते हैं. भक्तगण दशहरे में मां दुर्गा की पूजा करते हैं. दशमी के दिन व्रत एवं उपवास कर माँ दुर्गा अपने भक्त को विजय का आशीर्वाद देती हैं. दशहरा-विजयादशमी के अवसर आप सभी को बधाई.

 

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