मसूरी था गढ़वालियों का परदेस !

उत्तराखंड में कम उत्पादन वाली खेती और शिक्षा के सीमित साधनों ने लोगों को गाँव से पलायन करने को मजबूर कर दिया. पहाड़ से शहरों की ओर आना प्रवासियों की विवशता थी. पहाड़ से लगभग १०० साल पूर्व लोगों का दिल्ली-कलकत्ता-बम्बई जैसे महानगरों में आना आसान नहीं था. पहाड़ से आवागन की विकट स्थति के कारण लोग नजदीकी शहरों में रोजगार का जरिया ढूँढते थे. लोग या तो ज़गलों में ‘जंगलाती’ बनने चले जाते थे या फिर शहर जाना हो तो वे मसूरी तक आ जाते थे. खासतौर पर गढ़वाल के लोगों का परदेश मसूरी ही हुआ करता था. यहां पहाड़ के गाँवों से लोग पैदल चलकर दो-तीन दिन में पहुँचते थे. सफ़र के लिए भोजन की व्यवस्था साथ होती थी, काम की तलाश में आने वाले अपना राशन (संभाल) साथ लेके चलते थे. पहाड़ी रास्तों के कारण अधिकांश लोग समूह के रूप में ही मसूरी आते थे. मसूरी में लोग अपनी क्षमता के अनुसार रोज़गार करते थे. कुछ लोग कोठियों की चोकिदारी, तो कुछ घरों में खाना बनाने का काम करते थे. पर्यटक स्थल होने के कारण मसूरी में पर्यटकों को घुमाने, उनके बच्चे और उनका सामान (बोझा) ढोने का काम उन्हें मिल जाता था और वे उसमे लग जाते थे. तब शहर की तलाश मसूरी आकर खत्म हो जाती थी, लेकिन आज हम देश के हर कोने में हैं. या यूं कहें जहां दुनिया है, वहां प्रवासी उत्तराखंडी हैं और हमें नजदीक लाने के लिए हमारे पास उपलब्ध है uttarakhandpravasi.com

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