कविल्ठा, कालीदास की जन्मभूमि

मित्रो ! आप यह जानकर गौरवान्वित महसूस करेगे कि भारत वर्ष के महानतम कवि कालीदास का जन्म उत्तराखंड में हुआ था. तब गढ़वाल केदारखंड और कुमाऊ मानसखंड से नामित था. इनका जन्म ३३५ इसवी में मन्दाकिनी क्षेत्र में गुप्तकाशी के कालीमठ के आसपास स्थित “कविल्ठा” ग्राम में हुआ था. इनके बाल्यकाल का नाम बांदरु था. इनकी माता का नाम पारवती तथा पिता का नाम परामेश्वारानंद था. बाल्यकाल से ही ये बड़े मेधावी व प्रकृति प्रेमी थे. शिक्षा दीक्षा सम्प्पन करने के पश्चात् जव वे कविल्ठा गाँव लौटे तो माता पिता ने इनका विवाह रेवती नाम की कन्या से कर दिया .. परन्तु वे अपनी बाल्यकाल सखा “विद्यावती” के प्रेम में इतने आशक्त थे की वे विवाहित होकर भी रूपसी कन्या विद्यावती को न भूल पाये और घर बार छोड़ विद्यावती के पास चले गए. विद्यावती विद्याधर (बादी) कन्या थी जबकि कालिदास ब्रह्मण परिवार से थे. क्षेत्र के ब्रह्मणो को क्लीदास का यह कृत्य अतीव नागवार लगा. उन्होंने न्याय पंचायत बिठाई. जिसंमें फैसला हुआ और कालिदास को सदैव के लिए राज्य से निष्कासित (देशनिकाला) किया गया.
कालिदास अपनी प्रेयसि विद्यावती की यादो को समेटे केदारखंड से बहुत दूर निकल गए. भटकते भटकते काफी समयोउपरांत वे राजस्थान के पुष्कर क्षेत्र पहुंचे और एक मंदिर में शरण ली. यहाँ उन्हने अपनी रचनाओ को गायनशैली में सुनाकर स्थानीय लगो को बहुत प्रभावित किया क्षेत्र के लोग उनकी नई नई रचनाओ को सुनने के लिए सदैव लालायित रहते थे. वे अपनी कालजयी रचनाओ में लीन हो गये . समयोपरांत तत्कालीन महाराजा विक्रमादित्य को इस महान कवि की अति विशिष्ठ रचनाओ और विद्वता की प्रसिद्धि पहुची तो उन्होंने इन्हे सआदर राजदरबार बुलावा भेजा। महाराजा विक्रमादित्य इनकी रचनाओ से इतने प्रभावित हुए की उन्होेने कालिदास को राज कवि घोषित कर दिया.
महाकवि कालिदास की कालजयी रचना “मेघटुतम” जिसमे उन्होंने विरह-व्यथा का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है , प्रेमरस से सराबोर प्राकृत के सबसे पास रहने वाले एक “पहाड़ी हिरदय ” की सम्बेदनाओ को बादलों का संदेशवाहक के रूप में जो चित्रण किया जगत में सर्वोत्तम है।
महाकवि कालीदास की महानतम रचनाये (काव्य ग्रंथ )
१) मेघदूतम २) कुमारसंभव ३) रघुवंशम ४) विक्रमोवर्शियम ५) अभिज्ञान सकुंतलम
-लेखक श्री राकेश पुंडीर (मुंबई)

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