फिर उत्तराखंड की उपेक्षा

केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में भी उत्तराखंड को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. जिससे पहाड़ की जनता निराश है. केंद्र सरकार में उत्तराखंड की भागीदारी न होने का अपने आप में एक रिकार्ड भी बन गया है. देश भर में अब उत्तराखंड के अलावा कोई ऐसा प्रदेश नहीं बचा है जहां से भाजपा को कोई सीट मिली हो और वहां से किसी न किसी को मंत्रीपद न मिला हो.
केन्द्रीय मंत्रिमंडल में वे राज्य भी शामिल हैं जहां से भाजपा को मात्र एक ही सीट मिली है, किन्तु उत्तराखंड से पांचों पर जीत दर्ज करने के बावजूद केंद्र ने घोर उपेक्षापूर्ण वर्ताव किया है. जिससे पहाड़ की जनता आहात है. भाजपा द्वारा उत्तराखंड की उपेक्षा का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है की तमिलनाडु में 48 में से मात्र एक कन्याकुमारी की सीट भाजपा को मिली और विजेता एमपी को मंत्री पद दे दिया गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश गुजरात के बाद उत्तराखंड ही ऐसा प्रदेश रहा, जहां कुल मतदान का 56 प्रतिशत हिस्सा भाजपा को मिला. इसी के साथ पांचों लोकसभा सीटें जिताकर राजस्थान जैसे अग्रणी भाजपाई राज्यों की कतार में खुद को शामिल करने में भी उत्तराखंड कामयाब रहा. मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में भी उत्तराखंड के किसी सांसद को जगह मिलने की आस उत्तराखंडी लगाये थे किन्तु उन्हें इस बार भी निराशा ही हाथ लगी, इससे यहां जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में घोर निराशा का आलम है. राज्य से लोस चुनाव में सबसे योग्य नेता भाजपा के ३-३ मुख्यमंत्री चुनाव जीत कर उत्तराखंड की जनता ने लोकसभा में भेजे. किन्तु ये उत्तराखंड से माननीय प्रधानमंत्री ने एक भी नेता को अपनी टीम में काम करने योग्य नहीं समझा. उत्तराखंड की जनता तब और भी आहात हुई है जब भाजपा एक तरफ प्रशासनिक अनुभव के नाम पर गोवा के मुख्यमंत्री के पद से लाकर केंद्र में मंत्री बनाती है, जबकि वाजपेयी सरकार में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को साकार करने की अहम जिम्मेद्दारी निभाने वाले पाहड के लोकप्रिय सांसद श्री भुवनचन्द्र खंडूरी, उत्तराखंड में १०८ जैसी जीवनदायिनी सेवा देने वाले सांसद श्री रमेश पोखरियाल निशंक, प्रशासनिक अनुभव और जनोन्मुखी सरकार का अनुभव रखने वाले श्री भगत सिंह कोशियारी जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों में से किसी पर भी भरोसा नहीं किया गया. केंद्र में इस अपमान का उत्तराखंड की जनता को सबक लेना चाहिए. यह हमारे राज्य के अनुभव का अपमान नहीं बल्कि पहाड़ के नेताओं और लोगों की राष्ट्रीय दलों के पीछे भागने की अंधी दौड़ का नतीजा है. जिन राज्यों में जनता भाजपा पर अंधविश्वास कर मोहित हो रही है वहां से किसी को मंत्री बनाना भाजपा को उचित नहीं लग रहा. भाजपा को पता है कि उत्तराखंड में उसकी जमीन को कोई खतरा नहीं है और “इस बार कांग्रेस है, अगली बार उसकी बारी है”. इस लिहाज से किसी को मंत्री भी बनाना पड़ा तो उत्तराखंड के विकास के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए २०१६ में बनाया जायेगा, क्योंकि चुनाव ०२१७ में होने हैं. पहाड़ की जनता और नेता भूल जाएंगे केंद्र में अपना अपमान और २०१७ में फिर हो जाएँगे भाजपामय!

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