पहाड़ों में बकरी पालन

पहाड़ों में बकरी पालन आजीविका के लिए सबसे फायदेमंद होता है. पाहड में लोग बकरियों का पालन वर्षों पूर्व से करते आ रहे हैं. इसका ऊन गर्म कपड़ों को बनाने आता था तो गोबर सबसे अच्छा खाद होता था. बकरी को नगद धन के रूप में माना जाता था. लेकिन बकरियों की खासियत ये होती है कि इन्हें घर में बांध कर नहीं पाला जाता. इन्हें सर्दी हो या गर्मी, बर्फ हो बारिश रोज चराने ले जाना पड़ता है. पाहड में बकरियों को चराने में सबसे ज्यादा सतर्कता की जरूरत होती है. जंगल का बाघ मौके की तलाश में रहता है. नजर हटी और दुर्घटना घटी की स्थिति बनी रहती है. साथ ही झुण्ड से बिछड़ने का भी खतरा रहता है. बकर्वालों की इसी पीड़ा को पहाड़ के गीतों में भी जगह मिली हुई है. वर्षोँ पूर्व गढ़वाल के प्रसिद्ध गायक श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी ने बकरी चराने वाले की पीड़ा को ‘मेरा ढेबरा हरची गेन- मेरा बखरा हरची गेन’ के रूप में व्यक्त की थी.

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