पत्थर “खिलोने” और पालतू पशु होते थे “साथी”

खेल-कूद व्यक्ति के जीवन निर्माण और शारीरिक विकास के लिए अहम माने जाते थे. पहाड़ के व्यक्ति इसलिए भी शहर के बच्चों से ज्यादा सबल होते थे क्योंकि उनका बचपन कठोर परिश्रम और कठिन हालातों में गुजरा होता था. पहाड़ के बच्चों के खेल भी उनकी शारीरिक क्षमता के विकास के सबसे अहम होते थे. मोबाइल और आधुनिक तकनीक से आज बच्चों की खेल की दुनिया भी बदल गई है, लेकिन तब पहाड़ के गांव में बच्चे मिट्टी-पत्थर में ही खेलते थे. इन्ही मिट्टी-पत्थरों से अनेक खेल खेले जाते थे. चोक में ६ खाने बनाकर एक पैर से ठुडा, गुल्ली-डंडा, भागा-भागी, पकड़ा-पकड़ी, लुकाछिपी जैसे खेल बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते थे. आज के बच्चे खा कर भी बीमार हो जाते हैं, तब के बच्चे दिन भर की थकान के बाद बिना खाए ही सो जाते थे और “बासी” खाना खा कर भी तंदुरस्त रहते थे. पहाड़ के बच्चों के साथी उनके घरों में पलने वाले पालतू पशु भेड-बकरी, गाय-भैंस के बछड़े, कुत्ते के कुकर बच्चे होते थे. पक्षियों की चहचाहट, उनके पंखों की उड़ान कोतुहल ही नहीं जिज्ञासा भी भरती थी बच्चों के मन में. पहाड़ के बच्चों के खिलोने “डाला-पत्थर”, लकड़ी के धनुष, चीड़ के बक्कल, किन्गोड़ की तलवार होते थे.

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