पत्थर को पारस बना देते थे गुरूजी 

गांव में शिक्षा का मतलब सिर्फ स्कूल जाना होता था. घरों में पढाई-लिखाई बहुत दूर की बात थी. गांव में जिन घरों में कोई साक्षर सदस्य होते थे उन घरों के बच्चों को तो कुछ घर में पढने-लिखने का मार्गदर्शन मिल जाता था लेकिन अधिकांश बच्चे बस स्कूल में जो सीखा उसी पढाई तक ही सीमित थे. पहाड़ के गांव के घरों में पहले ज्यादातर महिलायें रहती थी. महिलाएं तब बहुत कम साक्षर होती थी. बच्चे को स्कूल भेजना ही उनका फर्ज होता था, बाकी बच्चे की शिक्षा का पूरा दारोमदार मास्टर जी पर होता था. पहाड़ अधिकांश बच्चे घर में आकर बस्ता फेंक देते थे, फिर ये बस्ता सुबह जाते समय ही ढूँढा जाता था. स्कूलों में गुरूजी बच्चों पर बहुत मेहनत करते थे. १००-१५० बच्चों के स्कूल में अकेले गुरूजी प्रत्येक बच्चे को पत्थर से पारस बनाने की क्षमता रखते थे.

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