पंचोला को घर के बाहर आते हैं बच्चे

पहाड़ के घरों में जन्मा बच्चा जन्म के पांच दिन बाद घर से बाहर लाया जाता है. इस दिन को  पहाड़ में ‘पंचोला’ कहा जाता है. इस दिन सुबह से घर की साफ़-सफाई. मिट्टी से लिपाई-पोताई कर पवित्र जल का छिड़काव किया जाता है. पंडितों द्वारा जल में गोमूत्र मिलाकर मंत्रोच्चार से जल शुद्ध किया जाता है. इस जल को ‘कल्स्वानी’ कहा जाता है. कल्स्वानी यानि मंत्र के द्वारा पवित्र किये गए जल में स्वर्ण आभूषणों का पानी भी मिलाया जाता है. कल्स्वानी को उस घर में छिड़का जाता है, जिस घर में प्रसूता रहती हो. प्रसूता को भी यह पानी पिलाकर शुद्ध किया जाता है. गोमूत्र-कल्स्वानी को रोज स्नान के बाद प्रसूता को पीने के लिए दिया जाता है. प्रसूता के साथ रहने वाली महिलाओं को भी पांच दिन तक हर सुबह स्नान कर कल्स्वानी पी कर शुद्ध किया जाता है. पांचवें दिन कल्स्वानी पीने और छिड़कने के बाद घर शुद्ध किया जाता है. इस दिन ‘जौ’ का हवन कर बच्चे को धूप का दर्शन कराया जाता है. फिर पांच दिन के बाद जिस कमरे ‘ओबरे’ में जच्चा-बच्चा रहते हों वहां जाने पर स्नान की बाध्यता नहीं रहती. ‘पंचोला’ में गुड़-तिल और चावल मिलाकर बांटा जाता है. किसी शिशु के ‘पंचोला’ के गुड़-तिल और चावल खाने वाले उसके जन्म के प्रमुख साक्षी माने जाते हैं.

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