धान काटने के दिन से शुरू होते थे “झुमेला”

उत्तराखंड की कला-संस्कृति केवल मनोरंजन का साधन भर नहीं थी. ये पाहड के सामाजिक-सांस्कृतिक बंधन के जरिये लोगों को एक सूत्र में पिरोने के महत्वपूर्ण साधन थे. यहां हर ख़ुशी के अवसरों पर उसकी विशेषता के गीत गाये जाते थे. गीत-संगीत में पहाड़ की ख़ुशी, पहाड़ की व्यथा, पहाड़ की पीड़ा  समाहित होती थी. पाहड में तब मनोरंजन के साधन नहीं थे. इसलिए मेले-कौथिग, विवाह, तीज-त्योहार पर सामूहिक गीत-संगीत का रिवाज था. बारिश के बाद खेत के कामो का प्रतिफल भादों में लहलाती खेती में दिखना शुरु हो जाता था. लहलाती फसलें गांव में खाने-पीने की चिंताएं दूर कर देती थी. इस मोसम में पहाड़ का किसान सबसे खुश रहता था. इसी ख़ुशी की अभिव्यक्ति थी झुमेला. पहाड़ के सुदूरवर्ती गांवों में भाद्रपद “भादों” में जब फसलें कटनी शुरु होती थीं, उस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाता था. खासकर जब “भादों” के महीने में धान की कटाई शुरू होती थी उस रात से “झुमेला” लगने शुरु हो जाते थे. झुमेला में रात का खाना-पीना खाकर गांव की महिलाएं और पुरुष किसी एक चोक में एकत्र होकर सामूहिक गीत झूमते हुए लगाते थे. झुमेला में एक तरफ पुरुष और दूसरी तरफ महिलाएं कतारवध खडी होती थीं. झुमेला का एक छंद पुरुष शुरू करते हैं और वही बोल महिलाएं दोहराती हैं. पूरे चोक में गोल आकार में घूमते-झूमते हुए झुमेला गीत गाये जाते थे. इस बीच हास्य से जुडी छोटी-छोटी प्रस्तुतियां भी होती थी. झुमेले ठीक बड़ी दीपावली “यागास” तक लगाये जाते थे.

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