‘जड़ी-बूटियों’ पर थी जीवन की आस

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की चिंता आज भी बरकरार है, किन्तु वर्षोँ पूर्व पहाड़ के हर बुजुर्ग डाक्टर थे. वे बच्चों की छोटी-मोटी बीमारियों में लोगों का जीवन बचा लेते थे. जड़ी-बूटी पहचानने में कुछ ख़ास पारंगत भी होते थे, जिन्हें आयुर्वेद वैद्य यानी गांव के डाक्टर कहते थे. घर के ज्यादातर बुजुर्ग पाहड में पाई जानी वाली जड़ी-बूटियों के ओषधीय महत्व को भली भांति जानते थे. तब अस्पताल दूर की बात होती थी. बच्चों के जन्म के बाद बीमार होने पर गोलाचन्द, शिलाजीत, बंजलीस और अन्य आयुर्वेदिक् घुट्टी देकर इलाज किया जाता था. पाहड में एसी दवा वाली कई वनस्पतियों को बुजुर्गलोग पहचान रखते थे. ये वनस्पतियां ही बच्चों की बीमारी के इलाज के काम आती थी. लोग खुद भी इन वनस्पतियों को लाकर बच्चों को देते थे. जिसे ‘हर्याल’ कहा जाता था. हिमालय और बुग्यालों के बीच पाई जानी वाली अतीस-कडवे जैसी जडी-बुटी गांव के वैद्य लोग देते थे. लोग इन जड़ी-बूटियों को अपने घरों में वक्त मोके के लिए संभालकर रखते थे. नील कंठी पत्ते, बांज की छाल और अन्य आसानी से मिलने वाली जड़ी-बूटी और पत्तियां ही लोगों के स्वास्थ्य उपचार के साधन थे.

Share with your friend...Share on FacebookTweet about this on TwitterShare on LinkedInShare on Google+Email this to someone