गुरुजनों को घर से पहुंचाते थे राशन

इन्शान के जीवन में माता-पिता और गुरु देवता की सबसे बड़ी भूमिका होती है. शिक्षक ही जन्म के बाद संसार में जीने के लिए जीवन का अन्धकार मिटाने शिक्षा की ज्योति से बच्चों के भविष्य उज्जवल बनाने की नींव रखते हैं. माता-पिता और गुरु देवता की उत्तराखंड में भी बड़ी परम्परा थी. गुरुजनों का बड़े आदर भाव से सम्मान होता था. उतराखंड के गांव में सरकारी प्राथमिक स्कूल बहुत कम होते थे. पढाई के लिए गांव से काफी दूर जाना होता था. स्कूल के अध्यापक अनेक विषयों के जानकार होते थे, जिससे समाज में उन्हें श्रेष्ठता हासिल थी. तब स्कूल के अध्यापकों का वेतन बहुत कम होता था, इसलिए स्कूल पढने वाले बच्चों के अभिभावक अध्यापकों के लिए खाद्य सामग्री अपने-अपने घरों से दिया करते थे. मास्टर जी के लिए घर से बच्चों के पास गेंहू-कोदा का आटा, झंगोरा, चावल, दूध-घी सब कुछ अभिभावक देते थे. खेती पर लगने वाली हर फल-साग-सब्जी गुरुजनों को पहुंचाई जाती थी. शिक्षक का ध्यान भी पूरी तरह बच्चों की पढाई पर होता था. बच्चे स्कूल जाते समय रोज एक लकड़ी इंधन के लिए स्कूल लेके जाते थे. ये लकड़ी एक जगह रख गुरु जी के खाना बनाने के काम आती थी. लकड़ी ले जाना बहुत जरूरी होता था नहीं ले जाने पर दंड भी दिया जाता था. गुरूजी धर्म और जाति के बंधन से ऊपर होते थे और अभिभावकों से उनका परिवार जैसा रिश्ता होता था.

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