काली “पाटी” से मिलती थी शिक्षा की “किरण”

उत्तराखंड में आज तमाम साधनों के बाद भी बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का स्तर चिंता का सबब बना हुआ है. किन्तु पहले गांव में शिक्षा के भले ही साधन सीमित थे लेकिन जो स्कूल थे उनमे पढाई का स्तर बहुत उंचा होता था. बच्चे की प्राथमिक शिक्षा जीवन को आलौकित करने मील का पत्थर साबित होती थी. गांव में बच्चों के आज जैसी पाठ्यसामग्री नहीं होती थी. बच्चों के पास कलम-पेन्सिल दूर की बात होती थी. लड़की की पाटी पर मिट्टी डाल कर उस पर अक्षर उकेर कर पढाया जाता था. या फिर लकड़ी की पाटी को अंगारों के कोयले से चमकाकर/घिसकर उस पर सफ़ेद मिट्टी (कमेडा) की सफेदी से लिखा जाता था. कलम-दावत की जगह “बोल्ख्या” बच्चों की पढाई के साधन थे. बच्चे भी फटे-पुराने कपड़ों, नंगे पैर कई किमी की दूरी स्कूल आने के लिए तय करते थे. तब के ५वीं पढ़े हिंदी-गणित-भूगोल की अच्छी जानकारी रखते थे. ८वीं के बाद आगे की पढाई के लिए राजा की भी आज्ञा लेने होती थी. बताते हैं राजा तब ८वीं तक पड़े-लिखे युवाओं को पटवारी-मास्टरी या वन विभाग का काम सोंप देते थे. सरकारी रोजगार के लिए ८वीं तक पड़ना काफी माना जाता था.

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