काम ही धर्म और काम ही पूजा था महिलाओं का धर्म

उत्तराखंड के जन-जीवन की अगर बात करें तो महिलाएं सबसे अग्रणी भूमिका में रही हैं. पहाड़ के घरों को आबाद करने में महिलाओं की भूमिका पुरुषों से कई ज्यादा रही है. घर के काम की सारी जिम्मेदारी पहाड़ की महिलाओं की होती थी. सुबह-शाम काम ही काम पहाड़ की नारी की पहचान होती थी. जीवन की डगर इतना कठिन की खुद के लिए भी समय निकालना भी मुश्किल होता था. सुबह उठकर बुजुर्गों के लिए तम्बाकू भरने और गाय-भैंस दुहाने, चाय बनाने से पहाड़ की नारी की जो रोज की जीवनचर्या शुरू होती थी वो दिन कब ढला इन्हें पता ही चलता था. घर के काम, बच्चों की देखभाल, पालतू पशुओं के लिए जंगल से घास, खाना बनाने के लिए लकड़ी, साग-सब्जी की व्यवस्था, खेतों के काम की सारी जिम्मेदारी पहाड़ की नारी के कन्धों पर होती थी. पहाड़ की नारी की अपनी कोई पीड़ा नहीं होती थी उसका परिवार और घर का काम ही सब कुछ होता था. पहाड़ के घरों के पुरुष ज्यादातर परदेश होते थे. महिलाएं अकेले ही घर और खेती की जिम्मेदारी में खुद को समर्पित कर देती थी. पहाड़ की नारी की पीड़ा, उसके साहस का कोई सानी नहीं था. पहाड़ की बेटी-ब्वारियों का जीवन, उनकी पीड़ा को उतराखंड के गीत-संगीत में भी अग्रिम स्थान है.

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