आबादी क्षेत्रों में गुलदार की आहट

कभी जंगलों तक सीमित रहने वाला गुलदार अब आबादी में घुसने का आदी होता जा रहा है. आबादी क्षेत्रों में गुलदार की आहट, हमले और लोगों की मौत आम बात होती जा रही है. तीन वर्ष के उत्तराखंड के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि गुलदार को जंगलों के बजाए आबादी अधिक पसंद आ रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गुलदार के मिजाज में बड़ा बदलाव है. भारतीय वन्य जीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक और बाघ प्रजातियों पर शोध करने वाले डॉ. वाईके झाला के मुताबिक गुलदार पहले जैसा जंगली जानवर नहीं रह गया है. हैबीटेट चेंज होने के साथ ही इसका मिजाज भी बदलता जा रहा है. गुलदार के मिजाज में इस तरह के बदलाव की मुख्य वजह वैज्ञानिक जंगलों के निकट आबादी का बसना मान रहे हैं. दूसरे, गुलदार ऐसा जानवर है जो बेहद सूखे जंगलों में भी सर्वाइव कर सकता है. गुलदार के लिए भोजन की कमी हुई तो वह कुत्तों, गाय, भैंस, और सुअर को मारकर अपना पेट भरता है. जंगलों में शिकार की कमी होने से गुलदारों को भोजन का संकट पैदा हो रहा है. आबादी में उन्हें आसानी से भोजन (भेड़, बकरी, कुत्ता, गाय, भैंस, सुअर) मिल जाता है. किसी क्षेत्र में गुलदार के देखे जाने या उसके हमले के बाद वन विभाग उस जगह पर पिंजरा लगाता है. लेकिन गुलदार अब इस झांसे में नहीं आता. वह पिंजरे से दूर ही रहता है. वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि गुलदार मानव की इस चालाकी को जान गए हैं. वह पिंजरा पहचानने लगे हैं. इसकी तोड़ के लिए कैमरा ट्रैप लाया गया, लेकिन वह भी ज्यादा प्रभावी नजर नहीं आ रहा है. डॉ. झाला के मुताबिक आबादी पसंद बनते जा रहे गुलदार को कब्जे में करने के लिए अब नए तरीके विकसित करने की जरूरत है. गुलदार की एक खासियत और है. वह अपना शिकार केवल उन्हें बनाता है जो उसका कम विरोध करें. इसलिए ज्यादातर आबादी वाले मामलों में गुलदार ने महिलाओं और बच्चों पर ही हमला किया है. विशेषज्ञों के मुताबिक इस मामले में भी गुलदार चतुर है कि उसे किसका शिकार करना है.

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